Thursday, February 13, 2020

भारत में पहली बार यूट्यूब पर होगा अदालती कार्यवाही का प्रसारण

कलकत्ता हाईकोर्ट ने अपने एक ऐतिहासिक फ़ैसले में देश में पहली बार किसी मामले की सुनवाई का यूट्यूब पर लाइव स्ट्रीमिंग यानी सीधे प्रसारण का निर्देश दिया है. यह याचिका एक ऐसी पारसी महिला ने दायर की है जिसने ग़ैर-पारसी व्यक्ति से शादी की है.

वो अपने बच्चों के लिए पारसी धर्मस्थल अग्नि मंदिर यानी फ़ायर टेंपल में प्रवेश का अधिकार चाहती हैं.

पारसी जोरोस्ट्रियन एसोसिएशन ऑफ कलकत्ता यानी पीजेडएसी की वकील फिरोज़ी एडुलजी ने अदालत में कहा, "इस मामले की सुनवाई देश में पारसी समुदाय के तमाम लोगों के लिए बेहद अहम है. इसके नतीजे से समुदाय के सभी लोगों को फ़ायदा होगा."

अब हाईकोर्ट को इस बात का फ़ैसला करना है कि किसी ग़ैर-पारसी व्यक्ति से शादी करने वाली पारसी समुदाय की महिला के बच्चों को समुदाय के धर्मस्थान अग्नि मंदिर में प्रवेश का अधिकार है या नहीं.

कोलकाता में पारसी समुदाय के लोगों की तादाद विभिन्न वजहों से लगातार घट रही है और अब यह घटकर 500 से भी कम रह गई है.

बुधवार को कलकत्ता हाईकोर्ट के न्यायमूर्ति संजीब बनर्जी और न्यायमूर्ति कौशिक चंदा की एक खंडपीठ ने इस याचिका को स्वीकार करते हुए यूट्यूब पर अदालती कार्यवाही के सीधे प्रसारण के लिए अदालत कक्ष में दो विशेष कैमरे लगाने का निर्देश दिया है.

एन.मेहता और उनकी पुत्री शनाया मेहता व्यास ने मध्य कोलकाता के मेटकाफ़ स्ट्रीट स्थित पारसी फ़ायर टेंपल में प्रवेश के अधिकार की मांग करते हुए एक याचिका दाख़िल की है.

शनाया का पति पारसी नहीं है इसलिए पारसी समुदाय की परंपरा के तहत उनको अंग्नि मंदिर में प्रवेश करने का अधिकार नहीं है. लेकिन पीजेडएसी इस याचिका का विरोध कर रहा है.

यह याचिका जोरास्ट्रियन अंजुमन अतश अदारन ट्रस्ट के उन पदाधिकारियों के ख़िलाफ़ दायर की गई है जो ग़ैर-पारसी पति से पैदा होने वाले बच्चों को फ़ायर टेंपल में प्रवेश की अनुमति देने के ख़िलाफ़ हैं.

ट्रस्ट की दलील है कि चूंकि एक पारसी मां और ग़ैर-पारसी पिता की संतान होने की वजह से उनको यह अधिकार नहीं दिया जा सकता. हालांकि यह दोनों एक धार्मिक समारोह के ज़रिए पारसी समुदाय का अंग बन चुके हैं.

अदालत ने फ़िलहाल इस मामले की सुनवाई की तारीख़ तय नहीं की है. इससे पहले हाईकोर्ट की एकल पीठ ने लाइव प्रसारण की याचिका ख़ारिज कर दी थी. उसके बाद याचिकाकर्ताओं ने खंडपीठ में उस फ़ैसले को चुनौती दी थी. फ़ायर टेंपल में प्रवेश की अनुमति देने संबंधी मूल याचिका की सुनवाई न्यायमूर्ति देवांग्शु बसाक करेंगे. लेकिन फ़िलहाल सुनवाई की तारीख़ तय नहीं की गई है.

पीजेडएसी की एडवोकेट एडुलजी ने अदालत में दलील दी कि पारसी परंपरा के मुताबिक़ जाति से बाहर शादी करने वालों को मंदिर में भीतर जाने का अधिकार नहीं होता.

उन्होंने कहा, "हम चाहते हैं कि इस मामले का सीधा प्रसारण हो ताकि देश का समूचा पारसी समुदाय इस मामले की कार्यवाही और अदालत का फ़ैसला देखे."

सुप्रीम कोर्ट के तत्कालीन प्रधान न्यायाधीश दीपक मिश्र की अध्यक्षता वाली एक खंडपीठ ने 26 सितंबर 2018 को न्याय प्रक्रिया में पारदर्शिता लाने के लिए कार्यवाही के सीधे प्रसारण की मांग में दायर विभिन्न याचिकाओं पर सुनवाई के बाद इसके पक्ष में फ़ैसला सुनाया था.

उन्होंने कहा था कि जिस तरह जीवाणुओं का नाश करने के लिए सूर्य की रोशनी ज़रूरी है उसी तरह न्याय प्रक्रिया में पारदर्शिता लाने के लिए सीधा प्रसारण ज़रूरी है. हालांकि खंडपीठ ने तब यह भी साफ़ कर दिया था कि किन मामलों का सीधा प्रसारण होगा और किनका नहीं.

अब पहली बार कलकत्ता हाईकोर्ट ने सुप्रीम कोर्ट के उस फ़ैसले के हवाले से इस मामले के सीधे प्रसारण का निर्देश दिया है.

अदालत के फ़ैसले पर पारसी समुदाय ने ख़ुशी जताई है. कोलकाता में वर्ष 1909 में पारसी मुसाफ़िरों के लिए बने माणकजी रुस्तमजी धर्मशाला के मैनेजर दारा हंसोटिया कहते हैं, "इस मामले से परंपरा जुड़ी है. इसके सीधे प्रसारण से पूरे पारसी समुदाय को फ़ायदा होगा."

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