Monday, April 22, 2019

श्रीलंका की घटना को अंजाम देने वाले मंगल से नहीं उतरे: वुसअत का ब्लॉग

जिसने मुझे कोई नुकसान पहुंचाया या रंज दिया उसे मारना या उसके हाथों मर जाना तो फिर भी समझ में आता है.

कमरे में बंद होकर या खुले में आत्महत्या करना भी समझ आता है कि ज़हर खाने, पंखे से लटकने या खुद को गोली मारने का कोई कारण होगा.

ऐसा कारण जो ज़रूरी नहीं कि मेरी और आपकी समझ में भी तुरंत आ जाए.

मगर ऐसे इंसानों को मारना जिन्हें न आप और न ही वो आपको जानते हों, वो जवान, बच्चे, बूढ़े और महिलाएं जो न आपसे कभी मिले, न मिलेंगे. इन सबके लिए ये चाहना कि वो सब भी मेरे साथ मर जाएं और कितना अच्छा हो कि मेरे ही हाथों मरें.

और फिर इस मौत में भी अपने लिए स्वर्ग और जिन्हें मैं मार रहा हूं, उन्हें नरक भेजने का फ़ैसला भी खुद ही करना. पागलपन की अगर कोई भी आख़िरी सीमा हो सकती है तो इसके अलावा और क्या होगी.

आत्मघाती या मेरे दिमाग़ को आत्मघाती बारूद में बदलने वाला, दोनों की असल जगह मानसिक रोगों को अस्पताल या कोई बंदीखाना है. मगर पता तब चलता है जब पता चलने का कोई फ़ायदा ही न हो.

मुझे सब्र आ जाए अगर आत्मघाती सिर्फ खुद को या आसपास के लोगों की मौत का ही कारण बन जाए. मगर ऐसी घटनाओं में सिर्फ़ हत्यारा और बेगुनाह इंसान और इमारतें थोड़ी ख़त्म होती हैं.

ऐसी घटना में एक नस्ल का दूसरी नस्ल पर से, एक धर्म का दूसरे धर्म पर से, एक देश का दूसरे देश पर से और एक समाज का दूसरे समाज पर से मामूली विश्वास भी धीरे-धीरे उठता चला जाता है. और आख़िर में एक जंगल और इस जंगल में सिर्फ भेड़िये बचते हैं और वो एक-दूसरे को खाना शुरू कर देते हैं.

पर ये कैसे हो सकता है कि श्रीलंका में इतने इंसानों के चीथड़े उड़ने का किसी को फ़ायदा ही न पहुंचा हो? हर ऐसी घटना ख़ून की वो बोतल है जो हर तरह के अतिवाद को एक नया जोश, नई ज़िंदगी देती है और उसकी उम्र बढ़ा देती है.

भले ही वो मुसलमान, सिंहल, हिंदू ज़ायनिस्ट या बर्मी बौद्ध अतिवादी हों, बहुमत को अल्पसंख्यक के भूत से डराने का कारोबार करने वाला हो या फिर इस संसार में बर्मा, रवांडा और बोस्निया में नरसंहार का बाज़ार लगाने वाला.

शिंज़ियांग के वीगर नस्ल के लोगों को नई शिक्षा के नाम पर कैंपों में धकेलने वाला कोई चीनी कर्मचारी हो, कालों को ज़िंदा जलाने के बारे में सोचने वाला कोई गिरोह हो, अपने सिवा किसी भी दूसरे मुसलमान को काफ़िर समझकर मार डालने वाला जिहादी हो या फिर सोशल मीडिया के डिजिटल आतंकवादी...

सब के सब किसी एक व्यक्ति या गुट के किए गए इस भयंकर जुर्म का अपने-अपने तौर पर लाभ उठाते हैं और यूं नफ़रत का झाड़-झंखाड़ ऑर्गैनिक अंदाज़ में फैलता ही चला जाता है.

मगर इनमें से कोई भी मंगल से इस पृथ्वी पर नहीं उतरा. ये सब हममें से हैं, हमारे आसपास ही हैं, हमारे अपने दिमाग़ में छिपे हुए हैं. और मांग हमारी ये है कि सरकार कुछ करे.

Tuesday, April 16, 2019

प्रकाश राजः इस देश में चुनाव धंधा बन चुका है

हमने हमेशा ये फ़िल्मी लाइन सुनी है कि कीचड़ को साफ़ करने के लिए कीचड़ में कूदना पड़ता है.

हिंदी, तमिल और कन्नड़ फिल्मों के जाने-माने अभिनेता प्रकाश राज असल दुनिया में ऐसा करने का दावा करते हैं. 'सिंघम' और 'दबंग 2' का विलेन असली दुनिया में हीरो की भूमिका निभाना चाहता है.

प्रकाश राज के अनुसार, "आज के सिस्टम में जो गन्दगी है, भ्रष्टाचार और नॉन-गवर्नमेंट है उसका मूल कारण चुनावी प्रक्रिया है."

उन्होंने इस 'भ्रष्ट सिस्टम' का हिस्सा बन कर चुनावी मैदान में प्रवेश किया है ताकि इसमें सुधार लाने में मदद की जाय.

वो बेंगलुरु सेंट्रल से एक निर्दलीय उमीदवार की हैसियत से लोकसभा का चुनाव लड़ रहे हैं.

"इस देश में चुनाव एक धंधा बन चुका है", बीबीसी से एक ख़ास मुलाक़ात में वो इस 'भ्रष्ट' सिस्टम पर दबंग तरीके से प्रहार करते हैं.

वो कहते हैं, "किसी भी पार्टी का 15-20 प्रतिशत वोट पैसे से ही हासिल किया जाता है."

प्रकाश राज ने इसी सिस्टम से सवाल करने के लिए 'हैशटैग जस्ट आस्किंग' की मुहिम सोशल मीडिया पर शुरू की थी जिससे उन्हें एंटी-मोदी समझा जाने लगा.

लेकिन वो कहते हैं, "मैं नरेंद्र मोदी के ख़िलाफ़ नहीं हूँ. वो मेरे चाचा थोड़े ही हैं. वो मेरे भी प्रधानमंत्री हैं. मैं सत्ता पर बैठी सरकार से सवाल कर रहा हूँ."

वो अपनी सभाओं में भी नौकरियों पर सवाल उठा रहे हैं, "नौकरियों, झूठे वादों, देश को बांटने वाली सियासत पर मैं सवाल कर रहा हूँ."

शायद इसीलिए उन्होंने अपना चुनाव चिन्ह सीटी रखा है. वो कहते हैं, "व्हिसल यानी व्हिसल ब्लोअर. मैं लोगों को भ्रष्ट सिस्टम से आगाह करता हूँ."

उनकी चुनावी मुहिम के दौरान जो नज़ारा सबसे प्रमुख तौर पर देखने को मिलता है वो है सभाओं में मौजूद लोगों का एक साथ सीटी बजाना.

बूढ़े, बच्चे, महिलायें सभी एक साथ सीटी बजा कर उनका स्वागत करते हैं.

लेकिन क्या सीटी की गूंजती आवाज़ मतदाताओं तक पहुँच रही है? सभा में मौजूद लोग ज़्यादातर ग़रीब हैं और 'सिस्टम' से दुखी हैं.

शकील यूनुस नामक एक युवा ने कहा कि उनकी बेरोज़गारी उन्हें प्रकाश राज के क़रीब लाई है.

वो कहते हैं, "उनकी आवाज़ में दम है." फलों की दुकान में खड़े कुछ ग्राहकों ने कहा कि प्रकाश शायद चुनाव जीत न सकें लेकिन उन्होंने जो मुद्दे उठाये हैं वो आम लोगों से जुड़े मुद्दे हैं.

प्रकाश राज ऐसे ही मुद्दे लोकसभा में उठाना चाहते हैं. और वो इस चुनावी प्रणाली को बदलना चाहते हैं जो "एक ब्रांडिंग बन चुका है, मार्केटिंग टूल बन चुका है, बांटने वाली सियासत बन चुका है, पैसे से वोट ख़रीदते हैं. वोट ग़रीब ही अधिक देते हैं, लेकिन वो ग़रीबों को ग़रीब ही रखते हैं."

लेकिन प्रकाश राज के चुनाव जीतने की संभावना कितनी है? उनके ख़िलाफ़ इस क्षेत्र से पिछले दो बार जीतने वाले उमीदवार हैं भारतीय जनता पार्टी के पीसी मोहन. उनके मुक़ाबले में हैं कांग्रेस के युवा नेता रिज़वान अरशद. यहाँ मुस्लिम वोटरों की संख्या मायने रखती है.

सियासी विश्लेषक और शहर में कई लोग ये समझते हैं कि प्रकाश राज सेक्युलर और नॉन-बीजेपी वोट काटेंगे जिससे रिज़वान अरशद को नुकसान होगा और पीसी मोहन लगातार तीसरी बार यहाँ से जीत कर हैट्रिक पूरी कर लेंगे.

लेकिन प्रकाश राज ने इस बात से इंकार किया कि वो कांग्रेस का वोट काट रहे हैं, "ये कौन कह रहा है? ये कांग्रेसी कह रहे हैं. पिछले दो बार वो यहाँ से हारे हैं. अगर वो जीतते तो आप कह सकते हैं मैं इस बार उनका वोट काट रहा हूँ."

लेकिन सेक्युलर ताकतें भी, जिसका वो नेतृत्व करने वाला नेता समझे जाते हैं, डरी हैं कि कहीं बीजेपी को इसका फ़ायदा न हो जाए.

क्या जाने-अनजाने मोदी-विरोधी कहे जाने वाले प्रकाश राज मोदी को फ़ायदा करा रहे हैं? इस पर वो कहते हैं, "क्या कांग्रेस सेक्युलर है? कांग्रेस और बीजेपी दोनों विभाजित करने वाली पार्टियां हैं. मैं किसी के ख़िलाफ़ नहीं हूँ."

वो आगे कहते हैं, "मैं सेक्युलर इंडिया की आवाज़ बन चुका हूँ तो मैं अप्रसिद्ध बनने के लिए भी तैयार हूँ". मैंने लोगों से संवाद शुरू किया है. हमें सियासी पार्टियों वाली राजनीति नहीं चाहिए, हमें लोगों का प्रतिनिधित्व करने वाले नेताओं की ज़रूरत है."

प्रकाश प्रकाश राज बेंगलुरु में 1965 में पैदा हुए. उनका नाम प्रकाश राय था लेकिन फ़िल्म ने उन्हें प्रकाश राज का नाम दिया. वो कहते हैं कि स्थानीय लोगों की समस्याओं से वो पूरी तरह से वाक़िफ़ हैं.

उनका कहना था कि वो धर्म या सेकुलरिज्म के नाम पर वोट नहीं मांग रहे हैं. वो स्थानीय होने के नाते लोगों से मिल रहे हैं, सभी समाज के लोगों से.

Tuesday, April 9, 2019

‘हेमा मालिनी की फ़ोटो हमारी मेहनत के साथ मज़ाक़ है.’

राजेंद्री देवी अपनी छोटी-छोटी पोतियों के साथ गेहूं की फ़सल काट रही हैं. उनका पूरा बदन पसीने से तर बतर है.

गेहूं की कटाई को खेती का सबसे मुश्किल काम माना जाता है. एक तो गर्म मौसम और उस पर हांड़-तोड़ मेहनत.

यही वजह है कि ज़मींदार किसान गेहूं अपने हाथ से काटने के बजाए राजेंद्री देवी जैसी भूमिहीन मज़दूरों से कटवाते हैं.

राजेंद्री देवी तीन बीघा गेहूं का खेत काट रही हैं. उनके पति के अलावा उनकी छोटी-छोटी नौ पोतियां भी इस काम में लगी हैं.

इस खेत को काटने में उन्हें हफ़्ते भर का समय लग सकता है और इसके बदले में उन्हें तीन मन यानी 120 किलो गेहूं मिलेगा.

राजेंद्री देवी कहती हैं, "हम यहां मज़दूरी करते हैं. खेत-खेत जाकर गेहूं काटते हैं. तीन बीघा काटने के तीन मन गेहूं मिलेंगे."

वो कहती हैं, "दो सौ-ढाई सौ रुपये रोज़ भी मज़दूरी नहीं बैठती है. क्या होता है इतने पैसों में? एक किलो तेल नहीं मिल पाता है. ये बहुत कठिन काम है और कभी-कभी तो मज़दूरी भी खा जाते हैं. मेहनत करवाकर भगा देते हैं. हम रोते चले आते हैं जंगल से."

राजेंद्री देवी भूमिहीन मज़दूर हैं. छह साल पहले उनके बेटे और बहू की मौत के बाद पीछे रह गई हैं नौ पोतियां जिनका पेट भरने की ज़िम्मेदारी अब अकेली राजेंद्री देवी पर है.

गेहूं कटाई करके वो पूरे साल भर के खाने का इंतेज़ाम करेंगी. राजेंद्री देवी कहती हैं कि उन्हें किसी भी सरकारी योजना का कोई फ़ायदा नहीं मिलता है.

वो कहती हैं, "किसी सरकार ने कोई मदद नहीं की है. इतने दुखी हैं कि बता नहीं सकते. कोई कुछ नहीं देता है. हमने कहा पेंशन खोल दो, इन बालकों को कुछ खाने-ख़र्चे को मिल जाए, कोई पेंशन न खोली. मांग-मांग कर तो कपड़े पहनाते हैं."

अपनी फटी हुई शर्ट दिखाते हुए वो कहती हैं, "हम ऐसे फटे कपड़े पहनने लायक़ हैं. हमारे आगे मजबूरी है. जब ऊपर चले जाएंगे तब ही मजबूरी दूर होगी हमारी उससे पहले हमारी मजबूरी दूर नहीं होगी."

हाल ही में मथुरा से सांसद हेमा मालिनी की हाथ में दरांती और गेहूं की बालियां लिए तस्वीर ख़ूब वायरल हुई. ड्रीम गर्ल हेमा मालिनी सत्ताधारी पार्टी की पोस्टर गर्ल भी हैं.

अगर सरकारी योजनाओं की नाकामी का कोई पोस्टर बने तो उसकी पोस्टर गर्ल राजेंद्री देवी हो सकती हैं.

विकास की 'काली कहानी'

जिस खेत में वो गेहूं काट रही हैं वो यमुना एक्सप्रेस वे से जुड़ता है.

एक ओर देश के तेज़ी से दौड़ते विकास की रफ्तार है और दूसरी ओर अपनी ज़िंदगी के ख़त्म होने का इंतज़ार करती एक मजबूर मज़दूर.

बच्चियों से गेहूं कटवाने के सवाल पर वो कहती हैं, "कुछ तो सहारा मिलेगा. मन दो मन गेहूं आ ही जाएगा. जब ये बच्चे भूखे सोएंगे तो कौन पूछेगा? कोई मदद नहीं करता, न समाज न सरकार. हमसे किसी को कोई मतलब नहीं है."

उनकी पोतियां बताती हैं, हम सुबह सात बजे खेत में आ जाते हैं, शाम छह बजे तक यहीं रहते हैं. पूरा दिन गेहूं काटते हैं.

खेत मालिक सत्यपाल सिंह कहते हैं, "हेमा मालिनी ने फोटो खिंचवाकर दिखावा किया है. असल में गेहूं काटना उनके बस की बात कहां हैं. ये बहुत मेहनत का काम है. सारा दिन धूप में पसीना बहाना पड़ता है, हमसे नहीं कटते हैं, वो क्या काटेंगी?"

भूमिहीन किसानों की दशा
अक्सर भूमिहीन परिवारों की महिलाएं ही गेहूं की कटाई करती हैं. तीन बच्चों की मां पिंकी अपने परिवार के साथ गेहूं काट रही हैं.

उनके हाथ ये काम करके सख़्त हो गए हैं उनमें गांठें पड़ गई हैं.

पिंकी कहती हैं, "हाथों में बहुत दर्द होता है. ये बहुत भारी मज़दूरी है. लेकिन मिलता इतना है कि बस पेट की भूख ही मिटती है. हमें इस काम के बदले पैसे नहीं मिलते हैं बल्कि गेहूं मिलते हैं."

"हम ग़रीबों के लिए कहीं कुछ नहीं है. वोट डालते हैं. नेता बनने के बाद कोई कुछ पूछता भी नहीं. कच्चे घरों में रहते हैं, हमें कोई घास नहीं डालता. चुनावों में ये और होता है कि फ्री शराब बांट देते हैं. पियो मौज लो, हम जनानियों के लिए तो कुछ भी नहीं है. जैसे-तैसे टाइम काट रहे हैं."

वो कहती हैं, "हम खेतों में काम करते हैं, फिर घर जाकर खाना भी बनाते हैं. आदमियों से भी ज़्यादा काम करते हैं. हाथों में इतना दर्द होता है लेकिन फिर भी काम करते हैं."

सावित्री देवी भी भूमिहीन मज़दूर हैं. वो सुबह पहले घर का काम करती हैं फिर खेत काटने आती हैं. सारा दिन खेत में काम करने के बाद जब दिन छुपने पर वो घर पहुंचती हैं तो उनके पास आराम करने के लिए समय नहीं होता. वो बच्चों के लिए खाना बनाती हैं, पूरे परिवार की हंडिया-रोटी करने के बाद ही उन्हें सुकून के कुछ पल मिलते हैं.

अक्सर पति दारू के नशे में होते हैं और कुछ बोलने पर पिटाई भी कर देते हैं. वो कहती हैं कि कई बार रोते-रोते रात बीत जाती है.

वो कहती हैं कि अभी तक किसी भी सरकार की योजना का कोई फ़ायदा उन्हें नहीं मिलता है.

वो कहती हैं, "सरकार भी हम ग़रीबों के लिए कुछ नहीं कर रही. दारूबाज़ों ने दारू चला रखी है. आदमी गाली देते हैं. शाम-सवेरे मारते हैं. पुरुष जंगल में छेड़ देते हैं. सारा दिन भूखे बाल बच्चों को लिए जंगल में पड़े रहते हैं."

"नाज-पानी इतना महंगा हो गया. तेल महंगा कर रखा है. साग-सब्ज़ी बहुत महंगी कर रखी है. बालकों को कैसे-कैसे पाल रहे हैं किसी को नहीं पता? दारू वाले तो दारू पीकर सो रहे हैं, उन्हें क्या पता चार बालक कैसे पल रहे हैं."

फ़ोटो खिंचाना अलग काम है और गेंहूं काटना अलग
उधर राष्ट्रीय राजधानी दिल्ली से कुछ ही दूर दादरी क्षेत्र के एक गांव में कश्मीरी अपने दो नौजवान बेरोज़गार बेटों के साथ गेहूं की फ़सल काट रही हैं.

हेमा मालिनी की तस्वीर देखते हुए वो कहती हैं, "फ़ोटो खिंचाना अलग काम है, गेहूं काटना अलग काम. ये खेतीबाड़ी का सबसे भारी काम है. ऐसी फ़ोटो हमारी मेहनत के साथ मज़ाक़ है."

कश्मीरी कहती हैं, "सिर का पसीना पैर से निकल जाता है. मजबूरी है तो ये मज़दूरी कर रहे हैं. गर्मी लगती है, बहुत कठिन काम है. तीन चार लोग लगे हैं. पूरे दिन में एक बीघा भी नहीं कटेगा. बच्चों का पेट भरना है इसलिए कर रहे हैं."

राजेंद्री की तरह ही कश्मीरी को भी किसी सरकारी योजना का कोई फ़ायदा नहीं मिला है. खेत काटने के बदले उन्हें गेहूं मिलेंगे.

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