उत्तर कोरिया के नेता किम जॉन्ग उन ने कहा है कि वह परमाणु हथियारों को नष्ट करने को लेकर प्रतिबद्ध हैं लेकिन उन्होंने अमरीका को चेताया कि अगर वह उनके देश पर अपने प्रतिबंध बरक़रार रखता है तो उनका इरादा बदल भी सकता है.
किम जॉन्ग उन ने यह नई बात अपने नए साल के देश के नाम संबोधन में कही है.
पिछले साल के भाषण के बाद उन्होंने अपने देश के संबंध दक्षिण कोरिया और अमरीका के साथ बेहतर किए थे. उनके इस कूटनीतिक क़दम को अभूतपूर्व बताया जा रहा था.
किम और अमरीकी राष्ट्रपति डोनल्ड ट्रंप ने जून 2018 में परमाणु हथियार नष्ट करने को लेकर मुलाक़ात की थी लेकिन इसके अब तक कुछ ही परिणाम सामने आए हैं.
2017 में उत्तर कोरिया द्वारा परमाणु मिसाइल के परीक्षण के बाद अमरीका और उत्तर कोरिया के बीच तल्ख़ियां बढ़ गई थीं. उत्तर कोरिया का दावा था कि उसकी मिसाइल अमरीका तक जा सकती है जिसके बाद दोनों के बीच युद्ध तक छिड़ने की बात हो रही थी. इसके बाद दोनों में मेल-मिलाप हुआ
किम ने क्या-क्या कहा
मंगलवार की सुबह सरकारी चैनल पर दिए अपने संबोधन में किम ने कहा, "अगर अमरीका पूरी दुनिया के आगे किए अपने वादे को नहीं निभाता है और हमारे गणराज्य पर दबाव और प्रतिबंध लगाता है तो हमारे पास अपने हित और संप्रभुता को सुरक्षित रखने के नए रास्ते का चयन करना होगा."
उन्होंने कहा कि वह ट्रंप से कभी भी और किसी भी समय मिलने के लिए तैयार हैं.
उत्तर कोरिया के परमाणु और बैलिस्टिक मिसाइल हथियार कार्यक्रमों की वजह से संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद ने उस पर कई प्रतिबंध लगाए हुए हैं.
पिछले साल उत्तर कोरिया ने रिश्ते संवारे
पिछले साल अपने नए साल के भाषण में घोषणा की थी कि उनका देश दक्षिण कोरिया में होने वाले शीतकालीन ओलंपिक में भाग लेगा जिसके कारण दोनों देशों के संबंधों थोड़े मधुर हुए थे.
इसके बाद पिछले साल जून में ही किम जॉन्ग उन ने दक्षिण कोरिया के राष्ट्रपति मून जे-इन के साथ अंतर-कोरियाई सीमा पर एक सम्मेलन में भाग लिया था.
वे दोनों दो बार मिले लेकिन पिछले साल की सबसे ख़ास मुलाक़ात किम और ट्रंप के बीच रही.
यह ऐतिहासिक सम्मेलन सिंगापुर में हुआ जहां उत्तर कोरिया और अमरीका के शीर्ष नेत मिले. ऐसा पहली बार था जब किसी उत्तर कोरिया के नेता ने अमरीकी राष्ट्रपति से मुलाक़ात की थी.
उस समय दोनों ने परमाणु हथियार नष्ट करने के लेकर साथ काम करने पर सहमति जताई थी.
इसके बाद उत्तर कोरिया ने अपने मिसाइल और परमाणु कार्यक्रम रोक दिए हैं लेकिन इसमें बहुत अधिक बदलाव नहीं हुआ है.
उत्तर कोरिया पर यह भी आरोप लग चुके हैं कि उसने अपने परीक्षण स्थलों को नष्ट नहीं किया है.
हालांकि, राष्ट्रपति ट्रंप की फ़रवरी में किम के साथ मुलाक़ात प्रस्तावित है लेकिन इसका सटीक वक़्त और जगह अभी तय नहीं है.
Monday, December 31, 2018
Thursday, December 27, 2018
रोमन लोगों को क्यों देना पड़ता था पेशाब पर टैक्स?
बेल्जियम के ब्रसेल्स में मैनकेन पिस नाम की यह मूर्ति एक छोटे बच्चे की है जो सू-सू करता हुआ दिखाई देता है. इसे देखने के लिए लोग दूर-दूर से आते हैं.
यह मूर्ति ब्रसेल्स के लोगों और उनके सेंस ऑफ ह्यूमर की प्रतीक मानी जाती हैं.
पेशाब का प्रयोग प्राचीन समय से ही रोगों के निदान के लिए किया जाता रहा है. इसके कई और उपयोग भी थे.
इतिहास में पेशाब के उपयोग का पहला सिरा रोम सम्राट टिटो फ्लेविओ वेस्पासियानो (9-79 ईस्वी) के समय का मिलता है.
रोमन साम्राज्य के धोबीघाट या फुलोनिकस में पेशाब एकत्र किया जाता और उसे सड़ने के लिए छोड़ दिया जाता था.
इकट्ठा किया गया पेशाब अमोनिया बन जाता था.
और वह अमोनिया एक तरह का डिटर्ज़ेंट था जिसका इस्तेमाल कपड़े धोने के लिए किया जाता था.
रोमन दर्शनशास्त्री और लेखक सेनेका बताते हैं कि सफ़ेद ऊन के कपड़ों को भिगोने के बाद मजदूर या धोबी उन पर कूदते या डांस करते थे. रंग को निखारने और उनकी चिकनाई खत्म करने के लिए मुल्तानी मिट्टी, पेशाब और सल्फर का इस्तेमाल किया जाता था.
इसके बाद कपड़ों की गंध खत्म करने के लिए सुगंधित डिटर्ज़ेंट का इस्तेमाल किया जाता और उसमें उन कपड़ो को भिगोया जाता था.
हालांकि ये सेहत के लिए ठीक नहीं था.
धोबियों का काम अच्छे व्यवसाय में बदल रहा था लेकिन जब वेस्पासियानो सत्ता में आये तो उन्होंने पेशाब पर टैक्स लगाना शुरू कर दिया. ये टैक्स उन लोगों के लिए था जो रोम के सीवेज सिस्टम में जमा किए गए पेशाब का इस्तेमाल करना चाहते थे.
उनमें लेदर या चमड़े का काम करने वाले भी शामिल थे.
पेशाब जानवरों की खाल को नरम बनाने और उसे पकाने के काम में भी ली जाती थी क्योंकि अमोनिया का अधिक पीएच कार्बनिक पदार्थों को गला देता है.
पेशाब में जानवरों की खाल को गलाने से उनके बाल और मांस के टुकड़ों को अलग करने में आसानी होती है.
रोमन इतिहासकार स्युटोनियस बताते हैं कि वेस्पासियान के बेटे टिटो ने अपने पिता से कहा कि उन्हें पेशाब पर जुर्माना लगाना सबसे घिनौना काम लगा.
पेशाब से रिचार्ज हो सकेगा आपका स्मार्टफोन!
आपका पेशाब बताएगा, आप क्या खाते हैं
इसके जवाब में सम्राट ने एक सोने का सिक्का लेकर टिटो की नाक पर लगाया और पूछा कि क्या ये बुरा महकता है. उनके पिता ने उनसे कहा है कि ये ''पेशाब से आता है''.
यह मूर्ति ब्रसेल्स के लोगों और उनके सेंस ऑफ ह्यूमर की प्रतीक मानी जाती हैं.
पेशाब का प्रयोग प्राचीन समय से ही रोगों के निदान के लिए किया जाता रहा है. इसके कई और उपयोग भी थे.
इतिहास में पेशाब के उपयोग का पहला सिरा रोम सम्राट टिटो फ्लेविओ वेस्पासियानो (9-79 ईस्वी) के समय का मिलता है.
रोमन साम्राज्य के धोबीघाट या फुलोनिकस में पेशाब एकत्र किया जाता और उसे सड़ने के लिए छोड़ दिया जाता था.
इकट्ठा किया गया पेशाब अमोनिया बन जाता था.
और वह अमोनिया एक तरह का डिटर्ज़ेंट था जिसका इस्तेमाल कपड़े धोने के लिए किया जाता था.
रोमन दर्शनशास्त्री और लेखक सेनेका बताते हैं कि सफ़ेद ऊन के कपड़ों को भिगोने के बाद मजदूर या धोबी उन पर कूदते या डांस करते थे. रंग को निखारने और उनकी चिकनाई खत्म करने के लिए मुल्तानी मिट्टी, पेशाब और सल्फर का इस्तेमाल किया जाता था.
इसके बाद कपड़ों की गंध खत्म करने के लिए सुगंधित डिटर्ज़ेंट का इस्तेमाल किया जाता और उसमें उन कपड़ो को भिगोया जाता था.
हालांकि ये सेहत के लिए ठीक नहीं था.
धोबियों का काम अच्छे व्यवसाय में बदल रहा था लेकिन जब वेस्पासियानो सत्ता में आये तो उन्होंने पेशाब पर टैक्स लगाना शुरू कर दिया. ये टैक्स उन लोगों के लिए था जो रोम के सीवेज सिस्टम में जमा किए गए पेशाब का इस्तेमाल करना चाहते थे.
उनमें लेदर या चमड़े का काम करने वाले भी शामिल थे.
पेशाब जानवरों की खाल को नरम बनाने और उसे पकाने के काम में भी ली जाती थी क्योंकि अमोनिया का अधिक पीएच कार्बनिक पदार्थों को गला देता है.
पेशाब में जानवरों की खाल को गलाने से उनके बाल और मांस के टुकड़ों को अलग करने में आसानी होती है.
रोमन इतिहासकार स्युटोनियस बताते हैं कि वेस्पासियान के बेटे टिटो ने अपने पिता से कहा कि उन्हें पेशाब पर जुर्माना लगाना सबसे घिनौना काम लगा.
पेशाब से रिचार्ज हो सकेगा आपका स्मार्टफोन!
आपका पेशाब बताएगा, आप क्या खाते हैं
इसके जवाब में सम्राट ने एक सोने का सिक्का लेकर टिटो की नाक पर लगाया और पूछा कि क्या ये बुरा महकता है. उनके पिता ने उनसे कहा है कि ये ''पेशाब से आता है''.
Monday, December 17, 2018
दूसरे टेस्ट में भारत की 146 रनों से हार, ऑस्ट्रेलिया ने सिरीज़ बराबर की
भारत और ऑस्ट्रेलिया के बीच पर्थ में खेले गए टेस्ट मैच में टीम इंडिया को कंगारूओं ने 146 रनों से हरा दिया है.
भारत की इस हार के बाद टेस्ट सिरीज़ 1-1 से बराबर हो गई है.
चार टेस्ट मैचों की सिरीज़ में पहला मैच भारत ने जीता था.
दूसरे टेस्ट में टॉस जीतकर पहले बल्लेबाज़ी करते हुए ऑस्ट्रेलिया ने पहली पारी में 326 और दूसरी पारी में 243 रन बनाए थे.
इसके जवाब में टीम इंडिया पहली पारी में 283 बनाकर पवेलियन लौट गई. वहीं दूसरी पारी में भारत सिर्फ़ 140 रन बना सका.
किस ख़िलाड़ी ने बनाए कितने रन?
भारत की तरफ़ से मैच में कप्तान विराट कोहली ने पहली पारी में सर्वाधिक 123 रन बनाए. वहीं दूसरी पारी में कोहली ने 17 रन बनाए.
ऑस्ट्रेलिया की तरफ़ से हैरिस ने पहली पारी में 70 और दूसरी पारी में 20 रन बनाए. वहीं यूटी ख्वाजा ने पहली पारी में 5 और दूसरी पारी में 72 रन बनाए.
ऑस्ट्रेलियाई गेंदबाज़ एन एम लॉयन ने पहली बारी में पांच और दूसरी पारी में तीन विकेट लिए. वहीं एम ए स्टार्क ने पहली पारी में दो और दूसरी पारी में तीन विकेट झटके.
भारतीय गेंदबाज़ ईशांत शर्मा ने पहली बारी में चार विकेट और दूसरी पारी में एक विकेट लिया. वहीं मोहम्मद शमी ने दूसरी पारी में छह विकेट झटके.
क्यों ख़ास रहा पर्थ का मैच?
ये मैच इसलिए भी ख़ास रहा क्योंकि ऑप्टस मैदान में ड्रॉप-इन पिच है. लेकिन ये कौन सी पिच होती है और ड्रॉप-इन का मतलब क्या होता है?
ये ऐसी पिच होती है, जिसे मैदान या वेन्यू से दूर कहीं बनाया जाता है और बाद में स्टेडियम में लाकर बिछा दिया जाता है. इससे एक ही मैदान को कई अलग-अलग तरह के खेलों में इस्तेमाल किया जा सकता है.
सबसे पहले पर्थ WACA के क्यूरेटर जॉन मैले ने वर्ल्ड सिरीज़ क्रिकेट के मैचों के लिए ड्रॉप-इन पिचें बनाई थीं, जो साल 1970 के दशक में ऑस्ट्रेलियाई कारोबारी केरी पैकर ने आयोजित कराई थी.
इस सिरीज़ में ये पिच इसलिए अहम थीं क्योंकि उसका ज़्यादातर क्रिकेट डुअल पर्पज़ वेन्यू, यानी ऐसे जगह खेला गया, जहां एक से ज़्यादा खेल हो सकते थे. इसकी वजह ये थी कि टूर्नामेंट के मैच क्रिकेट के प्रभुत्व वाले इलाक़े से बाहर हुए थे.
क्या होती हैं ड्रॉप-इन पिचें?
ये ऐसी पिच होती है, जिसे मैदान या वेन्यू से दूर कहीं बनाया जाता है और बाद में स्टेडियम में लाकर बिछा दिया जाता है.
इससे एक ही मैदान को कई अलग-अलग तरह के खेलों में इस्तेमाल किया जा सकता है.
सबसे पहले पर्थ WACA के क्यूरेटर जॉन मैले ने वर्ल्ड सिरीज़ क्रिकेट के मैचों के लिए ड्रॉप-इन पिचें बनाई थीं, जो साल 1970 के दशक में ऑस्ट्रेलियाई कारोबारी केरी पैकर ने आयोजित कराई थी.
भारत की इस हार के बाद टेस्ट सिरीज़ 1-1 से बराबर हो गई है.
चार टेस्ट मैचों की सिरीज़ में पहला मैच भारत ने जीता था.
दूसरे टेस्ट में टॉस जीतकर पहले बल्लेबाज़ी करते हुए ऑस्ट्रेलिया ने पहली पारी में 326 और दूसरी पारी में 243 रन बनाए थे.
इसके जवाब में टीम इंडिया पहली पारी में 283 बनाकर पवेलियन लौट गई. वहीं दूसरी पारी में भारत सिर्फ़ 140 रन बना सका.
किस ख़िलाड़ी ने बनाए कितने रन?
भारत की तरफ़ से मैच में कप्तान विराट कोहली ने पहली पारी में सर्वाधिक 123 रन बनाए. वहीं दूसरी पारी में कोहली ने 17 रन बनाए.
ऑस्ट्रेलिया की तरफ़ से हैरिस ने पहली पारी में 70 और दूसरी पारी में 20 रन बनाए. वहीं यूटी ख्वाजा ने पहली पारी में 5 और दूसरी पारी में 72 रन बनाए.
ऑस्ट्रेलियाई गेंदबाज़ एन एम लॉयन ने पहली बारी में पांच और दूसरी पारी में तीन विकेट लिए. वहीं एम ए स्टार्क ने पहली पारी में दो और दूसरी पारी में तीन विकेट झटके.
भारतीय गेंदबाज़ ईशांत शर्मा ने पहली बारी में चार विकेट और दूसरी पारी में एक विकेट लिया. वहीं मोहम्मद शमी ने दूसरी पारी में छह विकेट झटके.
क्यों ख़ास रहा पर्थ का मैच?
ये मैच इसलिए भी ख़ास रहा क्योंकि ऑप्टस मैदान में ड्रॉप-इन पिच है. लेकिन ये कौन सी पिच होती है और ड्रॉप-इन का मतलब क्या होता है?
ये ऐसी पिच होती है, जिसे मैदान या वेन्यू से दूर कहीं बनाया जाता है और बाद में स्टेडियम में लाकर बिछा दिया जाता है. इससे एक ही मैदान को कई अलग-अलग तरह के खेलों में इस्तेमाल किया जा सकता है.
सबसे पहले पर्थ WACA के क्यूरेटर जॉन मैले ने वर्ल्ड सिरीज़ क्रिकेट के मैचों के लिए ड्रॉप-इन पिचें बनाई थीं, जो साल 1970 के दशक में ऑस्ट्रेलियाई कारोबारी केरी पैकर ने आयोजित कराई थी.
इस सिरीज़ में ये पिच इसलिए अहम थीं क्योंकि उसका ज़्यादातर क्रिकेट डुअल पर्पज़ वेन्यू, यानी ऐसे जगह खेला गया, जहां एक से ज़्यादा खेल हो सकते थे. इसकी वजह ये थी कि टूर्नामेंट के मैच क्रिकेट के प्रभुत्व वाले इलाक़े से बाहर हुए थे.
क्या होती हैं ड्रॉप-इन पिचें?
ये ऐसी पिच होती है, जिसे मैदान या वेन्यू से दूर कहीं बनाया जाता है और बाद में स्टेडियम में लाकर बिछा दिया जाता है.
इससे एक ही मैदान को कई अलग-अलग तरह के खेलों में इस्तेमाल किया जा सकता है.
सबसे पहले पर्थ WACA के क्यूरेटर जॉन मैले ने वर्ल्ड सिरीज़ क्रिकेट के मैचों के लिए ड्रॉप-इन पिचें बनाई थीं, जो साल 1970 के दशक में ऑस्ट्रेलियाई कारोबारी केरी पैकर ने आयोजित कराई थी.
Thursday, December 13, 2018
विदेशी शराब पीते थे लेकिन ज़मीन पर सोते थे
राज कपूर के बारे में एक कहानी बार बार सुनाई जाती है कि पचास के दशक में जब नेहरू रूस गए तो सरकारी भोज के दौरान जब नेहरू के बाद वहाँ के प्रधानमंत्री निकोलाई बुल्गानिन के बोलने की बारी आई तो उन्होंने अपने मंत्रियों के साथ 'आवारा हूँ' गा कर उन्हें चकित कर दिया.
1996 में जब राज कपूर के बेटे रणधीर कपूर और बेटी ऋतु नंदा चीन गए तो उनकी आँखों में उस समय आंसू आ गए जब चीनी लोगों ने उन्हें देखते ही 'आवारा हूँ' गाने लगते. उन्हें ये नहीं पता था कि ये दोनों राज कपूर के बेटे बेटी थे, लेकिन वो ये गीत गा कर राज कपूर और भारत का सम्मान कर रहे थे. कहा तो ये भी जाता है कि 'आवारा' माओ त्से तुंग की पसंदीदा फ़िल्म थी.
ऋतु नंदा बताती हैं कि 1993 में जब रूस के राष्ट्रपति बोरिस येल्तसिन भारत आए और उन्हें बताया गया कि वो उनसे मिलना चाहती हैं, तो न सिर्फ़ वो इसके लिए तैयार हो गए, बल्कि उन्होंने उनकी किताब पर एक नोट लिखा, "मैं आपके पिता से प्रेम करता था. वो हमारी यादों में आज भी मौजूद हैं."
आख़िर राज कपूर की लोकप्रियता का राज़ क्या था? एक बार जब राज कपूर लंदन में बीबीसी के बुश हाउश दफ़्तर में आए थे तो उन्होंने इसका जवाब देते हुए कहा था, "ये सन् 1954 का किस्सा है जब मैं अपनी दो तस्वीरें ले कर रूस गया था. उनमें से एक थी 'आवारा'. इस तस्वीर से हमारा रूस के लोगों से पहला परिचय हुआ. वो थोड़ा बहुत हिंदुस्तान को जानते थे, लेकिन इन तस्वीरों के ज़रिए वो हिंदुस्तान के और क़रीब आए."
"आवारा के क़िरदार की शक्लसूरत कुछ राज कपूर जैसी थी, लेकिन दिल उसका अवाम का था, हिंदुस्तान के उस नौजवान का था जो आज तक उसी प्यार से धड़कता है. दरअसल उन्होंने राज कपूर को नहीं अपनाया, उन्होंने हिंदुस्तान के उस नौजवान को अपनाया जिसका दिल बार बार यही कहता था."
राज कपूर की परवरिश और उन्हें राज कपूर बनाने में उनके पिता पृथ्वीराज कपूर का बहुत बड़ा हाथ था. उन्होंने राज कपूर के कहने पर उन्हें 1 रुपए महीने की नौकरी दी थी और उनका काम था स्टूडियो में झाड़ू लगाना.
राज कपूर की बेटी ऋतु नंदा बताती हैं, "राज कपूर दूसरे बच्चों की तरह ट्राम से स्कूल जाते थे. एक दिन बहुत तेज़ बारिश हो रही थी. राज ने अपनी माँ से पूछा कि क्या वो आज कार से स्कूल जा सकते हैं? उन्होंने कहा मैं तुम्हारे पिता से पूछ कर बताती हूँ. पृथ्वीराज कपूर ने जब ये सुना तो उन्होंने कहा इस बारिश में पानी के थपेड़े झेलते हुए स्कूल जाने में भी एक 'थ़्रिल' है. उसको इसका भी तज़ुर्बा लेने दो."
1996 में जब राज कपूर के बेटे रणधीर कपूर और बेटी ऋतु नंदा चीन गए तो उनकी आँखों में उस समय आंसू आ गए जब चीनी लोगों ने उन्हें देखते ही 'आवारा हूँ' गाने लगते. उन्हें ये नहीं पता था कि ये दोनों राज कपूर के बेटे बेटी थे, लेकिन वो ये गीत गा कर राज कपूर और भारत का सम्मान कर रहे थे. कहा तो ये भी जाता है कि 'आवारा' माओ त्से तुंग की पसंदीदा फ़िल्म थी.
ऋतु नंदा बताती हैं कि 1993 में जब रूस के राष्ट्रपति बोरिस येल्तसिन भारत आए और उन्हें बताया गया कि वो उनसे मिलना चाहती हैं, तो न सिर्फ़ वो इसके लिए तैयार हो गए, बल्कि उन्होंने उनकी किताब पर एक नोट लिखा, "मैं आपके पिता से प्रेम करता था. वो हमारी यादों में आज भी मौजूद हैं."
आख़िर राज कपूर की लोकप्रियता का राज़ क्या था? एक बार जब राज कपूर लंदन में बीबीसी के बुश हाउश दफ़्तर में आए थे तो उन्होंने इसका जवाब देते हुए कहा था, "ये सन् 1954 का किस्सा है जब मैं अपनी दो तस्वीरें ले कर रूस गया था. उनमें से एक थी 'आवारा'. इस तस्वीर से हमारा रूस के लोगों से पहला परिचय हुआ. वो थोड़ा बहुत हिंदुस्तान को जानते थे, लेकिन इन तस्वीरों के ज़रिए वो हिंदुस्तान के और क़रीब आए."
"आवारा के क़िरदार की शक्लसूरत कुछ राज कपूर जैसी थी, लेकिन दिल उसका अवाम का था, हिंदुस्तान के उस नौजवान का था जो आज तक उसी प्यार से धड़कता है. दरअसल उन्होंने राज कपूर को नहीं अपनाया, उन्होंने हिंदुस्तान के उस नौजवान को अपनाया जिसका दिल बार बार यही कहता था."
राज कपूर की परवरिश और उन्हें राज कपूर बनाने में उनके पिता पृथ्वीराज कपूर का बहुत बड़ा हाथ था. उन्होंने राज कपूर के कहने पर उन्हें 1 रुपए महीने की नौकरी दी थी और उनका काम था स्टूडियो में झाड़ू लगाना.
राज कपूर की बेटी ऋतु नंदा बताती हैं, "राज कपूर दूसरे बच्चों की तरह ट्राम से स्कूल जाते थे. एक दिन बहुत तेज़ बारिश हो रही थी. राज ने अपनी माँ से पूछा कि क्या वो आज कार से स्कूल जा सकते हैं? उन्होंने कहा मैं तुम्हारे पिता से पूछ कर बताती हूँ. पृथ्वीराज कपूर ने जब ये सुना तो उन्होंने कहा इस बारिश में पानी के थपेड़े झेलते हुए स्कूल जाने में भी एक 'थ़्रिल' है. उसको इसका भी तज़ुर्बा लेने दो."
Monday, December 10, 2018
विधानसभा चुनावी नतीजे- राजस्थान, मध्य प्रदेश और छत्तीसगढ़ में कांग्रेस आगे
पाँच राज्यों में हुए विधानसभा चुनावों के शुरुआती रुझानों में बीजेपी पिछड़ती दिख रही है. हालांकि मध्य प्रदेश में बीजेपी और कांग्रेस में कांटे की टक्कर है. राजस्थान में भी बीजेपी पिछड़ रही है और कांग्रेस आगे चल रही है. तेलंगाना में सत्ताधारी टीआरएस पूर्ण बहुमत की तरफ़ बढ़ रही है और मिज़ोरम में एमएनफ़ आगे है.
मध्य प्रदेश में पिछले 15 सालों बाद कांग्रेस शुरुआती रुझान में जीत की ओर बढ़ रही है. कांग्रेस 116 सीटों पर आगे और बीजेपी 100 सीटों पर. बीएसपी 6 पर और समाजवादी पार्टी चार विधानसभा क्षेत्रों में आगे चल रही है.
तेलंगाना में सत्ताधारी टीआरएस हुई और मज़बूत. टीआरएस 79 सीटों पर आगे और कांग्रेस 29 सीटों पर. दो पर बीजेपी, तीन पर टीडीपी और सात पर अन्य आगे.
संसद के शीतकालीन सत्र की शुरुआत से पहले मोदी ने सदन में चर्चा की जताई उम्मीद. विपक्षी दलों से संसद को चलाने में सहयोग देने की उम्मीद जताई.
मध्य प्रदेश के बघेलखंड में कांग्रेस, भोपाल में बीजेपी, चंबल में कांग्रेस और महाकौशल में भी कांग्रेस ही आगे चल रही है.
मध्य प्रदेश में सत्ताधारी बीजेपी 96 सीटों पर और कांग्रेस 110 सीटों आगे चल रही है. बीएसपी सात सीटों पर और पांच पर समाजवादी पार्टी आगे चल रही है.
चुनावी नतीजों के शुरुआती रुझान के बीच प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने बुलाई पार्टी की बैठक. शुरुआती रुझानों में बीजेपी पांचों राज्यों में पीछे चल रही है.
छत्तीसगढ़ में राजनांदगांव विधानसभा क्षेत्र से मुख्यमंत्री रमन सिंह शुरुआती रुझान में कांग्रेस उम्मीदवार करुणा शुक्ला से पिछड़ रहे थे. अब आगे निकले.
शुरुआती रुझान में छत्तीसगढ़ में कांग्रेस पूर्ण बहुमत की ओर. कांग्रेस 56 सीटों पर आगे और 27 पर बीजेपी. दो सीटों पर बीएसपी आगे.
छत्तीसगढ़ में कांग्रेस 51 सीटों पर आगे और बीजेपी 31 सीटों पर. बीएसपी एक सीट पर आगे.
मध्य प्रदेश में कांग्रेस 107 सीटों पर आगे जबकि सत्ताधारी बीजेपी 99 सीटों पर. बीएसपी सात सीटों पर आगे और एक पर निर्दलीय. मध्य प्रदेश में बीजेपी पिछले 15 सालों से सत्ता में है.
शुरुआती रुझान में कांग्रेस राजस्थान में 92 सीटों पर आगे और बीजेपी 79 सीटों पर आगे. बीएसपी तीन पर और निर्दलीय 6 विधानसभा क्षेत्रों में आगे.
मध्य प्रदेश में कांग्रेस और बीजेपी बराबरी पर. दोनों पार्टियां 92-92 सीटों पर आगे. बीएसपी 6 सीट पर आगे.
राजस्थान में कांग्रेस 89 सीटों पर आगे और बीजेपी 77 सीटों पर. बीएसपी तीन सीटों पर आगे और तीन पर निर्दलीय. पिछले 20 सालों से राजस्थान में हर पांच साल पर सरकार बदलती रही है.
मध्य प्रदेश में पिछले 15 सालों बाद कांग्रेस शुरुआती रुझान में जीत की ओर बढ़ रही है. कांग्रेस 116 सीटों पर आगे और बीजेपी 100 सीटों पर. बीएसपी 6 पर और समाजवादी पार्टी चार विधानसभा क्षेत्रों में आगे चल रही है.
तेलंगाना में सत्ताधारी टीआरएस हुई और मज़बूत. टीआरएस 79 सीटों पर आगे और कांग्रेस 29 सीटों पर. दो पर बीजेपी, तीन पर टीडीपी और सात पर अन्य आगे.
संसद के शीतकालीन सत्र की शुरुआत से पहले मोदी ने सदन में चर्चा की जताई उम्मीद. विपक्षी दलों से संसद को चलाने में सहयोग देने की उम्मीद जताई.
मध्य प्रदेश के बघेलखंड में कांग्रेस, भोपाल में बीजेपी, चंबल में कांग्रेस और महाकौशल में भी कांग्रेस ही आगे चल रही है.
मध्य प्रदेश में सत्ताधारी बीजेपी 96 सीटों पर और कांग्रेस 110 सीटों आगे चल रही है. बीएसपी सात सीटों पर और पांच पर समाजवादी पार्टी आगे चल रही है.
चुनावी नतीजों के शुरुआती रुझान के बीच प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने बुलाई पार्टी की बैठक. शुरुआती रुझानों में बीजेपी पांचों राज्यों में पीछे चल रही है.
छत्तीसगढ़ में राजनांदगांव विधानसभा क्षेत्र से मुख्यमंत्री रमन सिंह शुरुआती रुझान में कांग्रेस उम्मीदवार करुणा शुक्ला से पिछड़ रहे थे. अब आगे निकले.
शुरुआती रुझान में छत्तीसगढ़ में कांग्रेस पूर्ण बहुमत की ओर. कांग्रेस 56 सीटों पर आगे और 27 पर बीजेपी. दो सीटों पर बीएसपी आगे.
छत्तीसगढ़ में कांग्रेस 51 सीटों पर आगे और बीजेपी 31 सीटों पर. बीएसपी एक सीट पर आगे.
मध्य प्रदेश में कांग्रेस 107 सीटों पर आगे जबकि सत्ताधारी बीजेपी 99 सीटों पर. बीएसपी सात सीटों पर आगे और एक पर निर्दलीय. मध्य प्रदेश में बीजेपी पिछले 15 सालों से सत्ता में है.
शुरुआती रुझान में कांग्रेस राजस्थान में 92 सीटों पर आगे और बीजेपी 79 सीटों पर आगे. बीएसपी तीन पर और निर्दलीय 6 विधानसभा क्षेत्रों में आगे.
मध्य प्रदेश में कांग्रेस और बीजेपी बराबरी पर. दोनों पार्टियां 92-92 सीटों पर आगे. बीएसपी 6 सीट पर आगे.
राजस्थान में कांग्रेस 89 सीटों पर आगे और बीजेपी 77 सीटों पर. बीएसपी तीन सीटों पर आगे और तीन पर निर्दलीय. पिछले 20 सालों से राजस्थान में हर पांच साल पर सरकार बदलती रही है.
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