Monday, February 25, 2019

भारत-पाकिस्तान युद्ध से हो सकेगा कश्मीर की समस्या का समाधान?

पुलवामा में 40 सीआरपीएफ जवानों की जान लेने वाला 14 फरवरी को हुआ चरमपंथी हमला दिल दहला देने वाला था. विस्फोट के बाद बचे बस के टुकड़े और दूर-दूर तक पड़े हुए शरीर ​के हिस्से बहुत भयानक थे.

कुछ ही घंटों में पाकिस्तान आधारित जैश-ए-मोहम्मद ने इस हमले की जिम्मेदारी ली और जिस तरह यह हमला भारतीय मीडिया और सोशल मीडिया पर दिखाया गया उससे देशभर में गुस्से और शोक का माहौल बन गया.

दिल्ली में प्रधानमंत्री ने कॉफिन में आए जवानों के मृत शरीर को श्रद्धांजलि दी जिसे टीवी पर देखते हुए लोगों में आक्रोश और बढ़ गया. इस आक्रोश से सरकार पर कुछ न कुछ करने का दबाव बढ़ता गया.

इनमें जो सबसे ज़्यादा जोशीली और आक्रोशित बातें कही जा रही हैं और वो हैं 'मुंह तोड़ जवाब' और 'ख़ून का बदला ख़ून'.

एक टीवी चैनल ने 40 जवानों की जान के बदले 4000 पाकिस्तानियों यानि एक के अनुपात में 100 की जान लेने तक की मांग कर डाली थी.

क्या भारत और पाकिस्तान के बीच युद्ध ज़रूरी है? पुलवामा हमले के बाद लोगों के मूड को देखते हुए यह क्या अनिवार्य है और क्या ये पाकिस्तान द्वारा समर्थित चरमपंथ जैसे बड़े और जटिल मसले का समाधान कर देगा?

मुझे लगता है कि भारत द्वारा किसी तरह का सैन्य जवाब देने की संभावना बहुत ज़्यादा है. हालांकि, यह कब और कैसे होगा यह काफी अटकलों का विषय है और हर रात कुछ टीवी चैनलों पर इस पर विचार किया जाता है.

लेकिन, क्या इससे पुलवामा हमले के बाद बने उत्तेजक माहौल में कुछ बदलाव होगा? मुझे डर है, पर नहीं, क्योंकि ये स्वाभाविक है कि भारत द्वारा की गई कोई भी सैन्य कार्रवाई के जवाब में पाकिस्तान भी प्रतिक्रिया करेगा और तनाव भी बढ़ेगा.

वहीं, दोनों देश परमाणु शक्ति संपन्न हैं और इस कारण वैश्विक समुदाय को इस युद्ध में दखल देना होगा और तब किसी भी तरह की मध्यस्थता करनी पड़ेगी.

लेकिन, सैन्य कार्रवाई मुख्य समस्या का समाधान नहीं करेगी. जैश-ए-मोहम्मद जैसे समूह को पाकिस्तान में संरक्षण हासिल है और कश्मीर के एक भारतीय युवा को ही ऐसा जानलेवा और ख़तरनाक कदम उठाने के लिए तैयार किया जा सकता है.

हकीकत यह है कि भारत 1990 से पाकिस्तान की ओर से छद्म युद्ध का सामना कर रहा है और ये युद्ध चरमपंथियों के ज़रिए चलाया जा रहा है. जिसके कारण भारत को चरमपंथी हमले झेलने पड़ते हैं.

आप भारत में पिछले 25 सालों में हुए चरमपंथी हमलों को देख सकते हैं. इनमें दिसंबर 2011 में भारतीय संसद पर हुआ हमला शामिल है जो वाजपेयी सरकार में हुआ था. इसके बाद नवंबर 2008 में मनमोहन सिंह की सरकार में मुंबई पर चरमपंथी हमला हुआ और अब फरवरी 2019 में पुलवामा में जवानों पर हमला किया गया.

लश्कर-ए-तैयबा और जैश-ए-मोहम्मद जैसे चरमपंथी संगठनों को पाकिस्तानी खुफिया तंत्र यानि आईएसआई ने पोषित किया है और जैश ने जम्मू और कश्मीर में सबसे पहला हमला अप्रैल 2000 में किया था. उस समय श्रीनगर में भारतीय सेना के 15 कॉर्प्स मुख्यालय को निशाना बनाया गया था.

मैं यह बताना चाहता हूं कि पुलवामा एक भयावह और कई जानें लेने वाला हमला जरूर है लेकिन पहला चरमपंथी हमला नहीं है. ​वहीं, मौजूदा स्थितियों को देखते हुए यह आखिरी भी नहीं है.

मेरे ऐसा कहने का कारण है जम्मू और कश्मीर की आंतरिक सामाजिक-राजनीतिक स्थिति. आप कश्मीरी युवाओं की असहमति और नाराज़गी के बारे में पढ़ते होंगे. कुछ अलगाववादी नेताओं ने सीमा पार के सहयोग से इस असहमति का फायदा उठाया है.

बुरहान वानी (हथियार उठाने वाला कश्मीरी युवा जो मारा गया) की घटना के बाद घाटी के हालात ख़राब हो गए. हालात बिगड़ने का इससे पता चलता है कि सुरक्षा बलों पर पत्थरबाजी की घटनाएं होती हैं और सुरक्षा बलों में शामिल स्थानीय कश्मीरियों को छुट्टियों पर मार दिया जाता है.

मोदी सरकार के लिए दुख की बात है कि जम्मू-कश्मीर में बीजेपी और महबूबा मुफ़्ती की पीडीपी के बीच हुए गठबंधन से भी वांछित परिणाम नहीं आए.

अभी जम्मू-कश्मीर में राज्यपाल का शासन है और राज्य के दो स्थानीय दल पीडीपी और फारुक अब्दुल्ला की नेशनल कांफ्रेंस राजनीतिक समाधान खोजने में सक्षम नहीं हैं और राज्य में फैले असंतोष को स्वीकार करते हैं.

युद्ध की स्थिति में जम्मू-कश्मीर के ये हालात और भी बुरे हो जाएंगे. किसी भी तरह की सैन्य कार्रवाई से सिर्फ जान-माल का नुकसान ही होगा. सेना के जवानों और आम लोगों की जान जाएगी.

बहुत जल्द पाकिस्तान दुश्मनी को बढ़ा देगा और इसके बाद आर्थिक हमले होने की आशंका से भी इनकार नहीं किया जा सकता. वहीं, पाकिस्तान के साथ गुजरात सीमा के पास प्रमुख भारतीय हाइड्रोकार्बन फैसिलिटी की निकटता को देखते हुए इन परिसंपत्तियों को स्थायी नुकसान की आशंका को भी खारिज नहीं कर सकते.

कम शब्द में कहूं तो वास्तविक युद्ध खूनी, महंगा और मानव/आर्थिक क्षति के कारण कभी न भरपाई किया जा सकने वाला होगा.

अफसोस की पाकिस्तान के साथ युद्ध में अगर भारत जीत भी जाता है तो इससे कश्मीर समस्या का समाधान नहीं होने वाला है. बल्कि युद्ध पाकिस्तान के अंदर सेना की स्थिति और भारत-विरोधी गुटों को मजबूत करेगा.

लेकिन, इसका ये मतलब नहीं है कि भारत के पास कोई रास्ता नहीं है और वो इसी तरह चरमपंथी हमले झेलने के लिए बेबस है. राजनयिक तौर पर कुछ विकल्प हैं और कुछ अनुकूल आर्थिक-वित्तीय परिस्थितियां हैं जिनके इस्तेमाल को अंतर्राष्ट्रीय समुदाय स्वीकार सकता है.

हाल ही में धन शोधन तथा आतंकवादी वित्तीयन की समीक्षा करने वाली एफएटीएफ (फाइनेंशियल एक्शन टास्क फोर्स) की पेरिस में हुई बैठक में पाकिस्तान को ग्रे सूची में रखा गया है. इसका मतलब यह है कि पाकिस्तान को आईएमएफ या विश्व बैंक से मिलने वाले ऋण प्रभावित होंगे. ये ऐसे रास्ते हैं जिनका इस्तेमाल किया जा सकता है.

जहां तक सैन्य क्षमता की बात है तो भारत को अपने समग्र खुफ़िया तंत्र को और मजबूत करने की ज़रूरत है. इस अंतर के बारे में विश्लेषकों द्वारा 1999 के कारगिल युद्ध के बाद से बताया गया है लेकिन अब भी इस पर ध्यान दिया जाना बाकी है.

जैसा कि फैशन में है कुछ गुप्त कार्रवाइयां की जा सकती हैं लेकिन उन्हें सार्वजनिक करने की ज़रूरत नहीं है.

अब देखना है कि आने वाले दिनों में क्या होता है. लोकसभा चुनाव होने वाले हैं और इसके चलते कुछ करके दिखाने की कोशिश की जाएगी लेकिन उम्मीद है कि चुनावी फायदा के लिए देश युद्ध की तरफ़ न जाए. हालांकि, लोकतंत्र ऐसा करने के लिए बदनाम हैं.

Tuesday, February 19, 2019

Unerwarteter Ärger mit dem Eigenheim

Krach um 600 000 Franken Anschlussgebühren nach BaZ-Recherchen beigelegt – Therwil will Reglement revidieren

Therwil. Es geht um viel Geld, ungenaue Verträge, Reglemente, die willkürlich wirken und am Rande auch um die umstrittene Scientology-Kirche.

Zunächst begann alles in Minne. Die Firma Swiss Immo Trust baute von 2013 bis 2014 an guter Lage in Therwil die schmucke Überbauung Untere Mühle mit 26 Eigentumswohnungen. Doch die Freude an den Eigentumswohnungen verging den Bewohnern in den letzten sechs Monaten – nicht aufgrund der Wohnungen an sich, sondern weil plötzlich Forderungen von insgesamt 600 000 Franken im Raum stehen, mit denen die Stockwerkeigentümer nicht gerechnet haben und die für einige von ihnen kaum aufzubringen sind.

Hickhack um Zahlung
Bei dem Betrag handelt es sich um die Anschlussgebühren an die Kanalisation und Wasserversorgung der Gemeinde Therwil. Für die Stockwerkeigentümer ist klar: Diese Gebühren muss der ehemalige Bauherr Swiss Immo Trust bezahlen, denn die Eigentumswohnungen wurden im Zustand «schlüsselfertig» oder «wie besichtigt» verkauft, was auch ein funktionsfähiges Kanalisationssystem mit einschliesse. Eine Einschätzung, die auf Anfrage der BaZ auch der Advokat und Vizepräsident des Hauseigentümerverbandes Baselland, Alexander Heinzelmann, teilt: «Falls nichts Gegenteiliges im Vertrag oder in zusätzlichen, integrierten Vereinbarungen steht, dürfen die Käufer davon ausgehen, dass die Anschlussgebüren im Kaufpreis inbegriffen sind.»

Die Swiss Immo Trust machte jedoch monatelang keine konkreten Anstalten, die Rechnung der Gemeinde zu übernehmen. Glaubt man Simon von Fürstenhaus*, einem der Eigentümer, macht die Firma im Gegenteil Druck: «Zunächst sagten sie uns, dass sie nicht zahlen. Später hiess es dann, dass sie für einen Deal bereit sind, wenn wir auf unseren Anwalt verzichten. Und zu guter Letzt sind sie zu mir nach Hause gekommen und haben mir angeboten, die Gebühren zu übernehmen, falls ich ihnen ein Darlehen von 200 000 bis 350 000 Franken gebe», sagt von Fürstenhaus.

Die Namen, die von Fürstenhaus in diesem Zusammenhang nennt, sind keine Unbekannten und mit der Scientology-Kirche Basel verbunden. Auch die Swiss Immo Trust taucht auf einer Beobachter-Liste der von aktiven Scientologen geführten Firmen auf. Dies, weil der frühere Verwaltungsrat der Swiss Immo Trust, Rudolf Flösser, leitender Direktor bei Scientology Basel ist. Seine Firma, die Dr. Flösser Treuhand GmbH, hat für das Projekt Untere Mühle auch die Bauherrenberatung übernommen.

«Ich habe an sich nichts gegen Scientology», sagt von Fürstenhaus, der eine Hexenjagd gegen Scientology vermeiden will. Das Verhalten der Swiss Immo Trust in den letzten Monaten findet er trotzdem nicht okay und hat sich deshalb an die BaZ gewandt. Mit Erfolg: Was lange nicht möglich schien, war nach einer Anfrage der BaZ innerhalb eines Tages machbar – die Stockwerkeigentümer haben die schriftliche Bestätigung erhalten, dass Swiss Immo Trust die Gebühren übernimmt.

Christian Varga, Verwaltungsrat der Swiss Immo Trust, bestreitet, dass er die Übernahme der Gebühren je mit der Verleihung eines Darlehens verknüpft hat. Obwohl die Swiss Immo Trust die Gebühren nun übernimmt, ist er nach wie vor der Meinung, dass diese im Preis der Wohnung nicht mit eingeschlossen waren: «Die Kanalisations- und Anschlussbeiträge waren gemäss Vertrag von den Käufern zu tragen. Da jedoch üblicherweise die Kanalisations- und Anschlussbeiträge im Kaufpreis inbegriffen sind, haben wir uns aus Kulanzgründen bereit erklärt, diese Kosten zu übernehmen.» Dies habe er den Käufern im Februar mündlich mitgeteilt: «Wir hätten dies damals schriftlich machen können statt lediglich mündlich, um Klarheit zu schaffen», erklärte Varga.

Unangenehme Situationen
Was Simon von Fürstenhaus fast noch mehr ärgert als das Verhalten von Swiss Immo Trust, ist, dass die Gemeinde die Rechnung, in Kenntnis der Fakten, trotzdem an die Stockwerkeigentümer senden wollte. «Nur aufgrund eines willkürlichen Gummi-Reglements konnte es überhaupt zu dieser unangenehmen Situation kommen.» Das Abwasserreglement der Gemeinde besagt, dass bei Neubauten das Datum der Endschätzung des Gebäudes durch die kantonale Gebäudeversicherung Stichdatum für die Beitragspflicht ist. Auf den Termin der Schätzung haben Gemeinde, Verkäufer und Käufer kaum Einfluss. Im Fall der Unteren Mühle führte dieses Stichdatum dazu, dass die Rechnung trotz schlüsselfertigem Kauf an die Stockwerkeigentümer ging.

«Dieses Reglement ist veraltet, das muss auch die Gemeinde sehen. Sie hätte sich in dieser Angelegenheit auf unsere Seite stellen müssen», sagt von Fürstenhaus enttäuscht.

Laut Gemeindeverwalter Theo Kim muss die Gemeinde die Rechnung dem zum Zeitpunkt der Rechnungsstellung im Grundbuch eingetragenen Eigentümer stellen – ausser der Verkäufer bestätigt der Gemeinde, dass er die Kosten übernimmt, was im Fall von Swiss Immo Trust bisher offenbar nicht der Fall war. Die Schwächen des 25-jährigen Reglements, das ähnlich auch in vielen anderen Gemeinden in Kraft ist, sieht er jedoch auch: «Wir haben bemerkt, dass es in Einzelfällen zu verzwickten und unangenehmen Situationen führen kann.

Es gab auch einen Fall, bei dem Käufer tatsächlich zweimal bezahlen mussten», sagt Kim. Deshalb soll das Reglement noch dieses Jahr revidiert und vor die Gemeindeversammlung gebracht werden: «Darin ist vorgesehen, dass die Rechnung zu einem früheren Zeitpunkt erfolgt, zu dem der Verkäufer im Normalfall noch der Besitzer ist.» Einen Fall wie jenen der Unteren Mühle gäbe es dann nicht mehr.

Wednesday, February 13, 2019

जब हिंदू लड़के के प्यार में घर छोड़ा

आइशा और आदित्य की मुलाक़ात फ़ेसबुक पर हुई. तब वो बालिग भी नहीं थे. आइशा का नाम भी सच्चा नहीं था, तस्वीर भी नहीं पर बातें सच्ची थीं.

बातों का सिलसिला ऐसा बना कि दो साल तक थमा नहीं. बेंगलुरु में रहनेवाली आइशा और दिल्ली के आदित्य एक-दूसरे का चेहरा देखे बिना, मिले बिना, एक-दूसरे के क़रीब होते गए.

आइशा ने मुझे कहा कि उसे बिल्कुल यक़ीन नहीं था कि इस ज़माने में कोई लड़का सच्चे प्यार में विश्वास रखता होगा इसीलिए बातों के ज़रिए परखती रही.

एक बार ग़लती से अपनी आंखों की तस्वीर भेज दी. बस आदित्य ने बेंगलुरु के कॉलेज में दाखिला ले लिया. तब जाकर आदित्य की मुलाकत फेसबुक की इरम ख़ान, यानी असल ज़िंदगी की आइशा से हुई.

आदित्य कहते हैं, "हम मिले नहीं थे पर शुरू से जानते थे कि वो मुसलमान है और मैं हिंदू, धर्म हमारे लिए कभी मुद्दा नहीं रहा पर हमारे परिवारों को ये बिल्कुल क़बूल नहीं था."

उन्हें साफ़ कर दिया गया कि बिना धर्म परिवर्तन के शादी मुमकिन नहीं है. पर अपनी पहचान दोनों ही नहीं खोना चाहते थे.

आइशा ने घर छोड़ने का फ़ैसला किया. परिवार ने रोकने की कोशिश की पर आदित्य के साथ वो दिल्ली आ गई जहां वो लिव-इन रिलेशनशिप में रहने लगे.

आइशा कहती हैं, "पहले पांच महीने हमने खुद को एक कमरे में बंद कर लिया, कहीं आने-जाने में डर लगता था, कि कहीं कोई हमें मार ना दे क्योंकि हम अलग मज़हब से हैं."

उन्हीं दिनों दिल्ली में एक मुस्लिम लड़की से प्रेम संबंध रखने की वजह से 23 साल के एक लड़के, अंकित सक्सेना की हत्या कर दी गई थी.

लड़की के परिवारवाले गिरफ़्तार हुए और मुकदमा जारी है. इज़्ज़त के नाम पर हत्या का ख़ौफ़ और ख़तरा आइशा को अपने बहुत क़रीब लगने लगा था.

एक ओर नौकरी ढूंढना ज़रूरी था और दूसरी ओर शादी कर क़ानूनन तौर पर सुरक्षित होना.

आइशा और आदित्य साथ तो थे पर दुनिया में अकेले. तजुर्बा भी कम था. एक बार फिर इंटरनेट ने उनकी ज़िंदगी को नया मोड़ दिया.

जानकारी की तलाश उन्हें रानू कुलश्रेष्ठ और आसिफ़ इक़बाल के पास ले गई. पति-पत्नी का ये जोड़ा भी उन्हीं की तरह दो धर्मों से साथ आया था.

साल 2000 में इन्होंने 'स्पेशल मैरेज ऐक्ट' के तहत शादी की थी और अब 'धनक' नाम की संस्था चला रहे हैं.

वो आइशा और आदित्य जैसे जोड़ों को इस 'ऐक्ट' के बारे में जानकारी देने, काउंसलिंग करने और रहने के लिए सेफ़ हाउस जैसी सुविधाओं पर काम कर रहे हैं.

स्पेशल मैरेज ऐक्ट

स्पेशल मैरेज ऐक्ट 1954 के तहत अलग-अलग धर्म के लोग बिना धर्म परिवर्तन किए क़ानूनन तरीके से शादी कर सकते हैं.

शर्त ये है कि दोनों शादी के व़क्त बालिग हों, किसी और रिश्ते में ना हों, मानसिक तौर पर ठीक हों और अपनी सहमति देने के क़ाबिल हों.

इसके लिए ज़िला स्तर पर मैरेज अफ़सर को नोटिस देना होता है. नोटिस की तारीख़ से 30 दिन पहले से जोड़े का उस शहर में निवास होना ज़रूरी है.

ये नोटिस एक महीने तक सार्वजनिक तौर पर प्रदर्शित किया जाता है. इस दौरान परिवार वाले कई बार अपना एतराज़ ज़ाहिर कर सकते हैं.

कोई आपत्ति ना होने पर ही शादी गवाह की मौजूदगी में रजिस्टर की जाती है.

ये ऐक्ट भारत प्रशासित कश्मीर पर लागू नहीं होता.

आइशा और आदित्य उनसे कई बार मिले. 'धनक' के साथ जुड़े कई और जोड़ों से भी मुलाकात हुई.

अचानक एक नया परिवार मिल गया. अब वो दुनिया में इतने अकेले नहीं थे. हर जोड़े की आपबीती में अपनी प्रेम कहानी के अंश दिखते थे.

डर धीरे-धीरे जाता रहा. आइशा ने नौकरी पर जाना भी शुरू कर दिया.

आइशा कहती हैं, "पहले लगता था कि साथ तो रहने लगे हैं पर एक-दो साल में मार दिए जाएंगे, पर रानू और आसिफ़ को देखकर लगता है कि ऐसी ज़िंदगी मुमकिन है, ख़ुशी मुमकिन है."

रानू कहती हैं कि लड़का-लड़की में आत्म-विश्वास होना बहुत ज़रूरी है क्योंकि मां-बाप की मर्ज़ी के ख़िलाफ़ जाने की ग्लानि हमेशा परेशान करती रहती है.

इसीलिए वो परिवार से बातचीत का रास्ता खुला रखने की सलाह देती हैं.

इससे फ़ायदा ये भी होता है कि परिवार ये जान पाए कि उनके बच्चे एक साथ कितने ख़ुश हैं.

Wednesday, February 6, 2019

तमाम हरकतों के बावजूद मेरा नाम #MeToo में नहीं आया: शत्रुघ्न सिन्हा - पांच बड़ी ख़बरें

बीजेपी सांसद और अभिनेता शत्रुघ्न सिन्हा ने बुधवार को कहा है कि वह भाग्यशाली हैं कि उनका नाम कभी #MeToo आंदोलन में नहीं आया. उन्होंने कहा कि हर क़ामयाब आदमी की असफलता के पीछे एक महिला होती है.

हालांकि, उन्होंने सफ़ाई देते हुए कहा कि वह #MeToo आंदोलन का मज़ाक नहीं उड़ा रहे हैं और उनकी टिप्पणी को एक 'साफ़ हास्य' के तौर पर लिया जाना चाहिए.

एक पुस्तक विमोचन कार्यक्रम में उन्होंने कहा, "आज #MeToo के दौर में यह कहे जाने में बिलकुल शर्म या झिझक नहीं महसूस की जानी चाहिए कि हर क़ामयाब पुरुष की असफलता के पीछे एक महिला होती है. मैं ख़ुद को भाग्यशाली महसूस करता हूं कि तमाम हरकतें करने के बावजूद मेरा नाम #MeToo आंदोलन में नहीं आया."

मनी लॉन्ड्रिंग मामले में प्रवर्तन निदेशालय (ईडी) द्वारा रॉबर्ट वाड्रा से पूछताछ किए जाने पर पश्चिम बंगाल की मुख्यमंत्री ममता बनर्जी ने कहा है कि विपक्ष उनके साथ मज़बूती के साथ खड़ा है.

बनर्जी ने कहा, "यह कोई गंभीर मामला नहीं है, बस हर किसी को यूं ही नोटिस भेज दिया जा रहा है. तो हम साथ खड़े हैं और हम एकजुट हैं."

मुख्यमंत्री बनर्जी ने कहा कि यह चुनाव से पहले जानबूझकर किया जा रहा है.

ग़ौरतलब है कि कांग्रेस अध्यक्ष राहुल गांधी के जीजा रॉबर्ट वाड्रा से बुधवार को प्रवर्तन निदेशालय यानी ईडी के दफ़्तर में क़रीब छह घंटे तक पूछताछ हुई थी.

बीजेपी प्रवक्ता जीएल नरसिम्हा राव ने आरोप लगाया है कि साल 2012 में सेना के कथित तख़्तापलट की ख़बरों के पीछे तत्कालीन प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह के चार मंत्रियों का हाथ था.

बुधवार को एक अख़बार ने यह दावा किया था कि इस कथित तख़्तापलट के पीछे कांग्रेस के चार मंत्रियों का हाथ था.

इस ख़बर के बाद बीजेपी ने कांग्रेस अध्यक्ष राहुल गांधी से जवाब मांगा है, साथ ही पूरे मामले की जांच संसदीय कमेटी से कराने की मांग की है.

नरसिम्हा राव ने कहा कि कांग्रेस ने सेना के ख़िलाफ़ फ़र्ज़ी ख़बरें छपवाकर उसे बदनाम करने की कोशिश की है.

द संडे गार्डियन की रिपोर्ट में आईबी के अफ़सर के हवाले से कहा गया है कि तख़्तापलट की कोई कोशिश नहीं हुई थी.

रायपुर में पिछले सप्ताह एक पत्रकार को कथित तौर पर बीजेपी कार्यकर्ताओं द्वारा पीटे जाने के बाद बुधवार को पत्रकारों ने हेलमेट पहनकर बीजेपी नेताओं से बात की.

बीजेपी नेताओं के कार्यक्रम में पत्रकारों द्वारा हेलमेट पहनकर पहुंचने पर उन्होंने कहा कि वह बीजेपी को एक प्रतीकात्मक संदेश देना चाहते थे और अगर उन पर हमला होता है तो यह उसकी पहले से तैयारी थी.

बीते शनिवर को रायपुर में बीजेपी के ज़िला स्तर के नेताओं की बैठक में पत्रकार सुमन पांडे की पिटाई कर दी गई थी जिससे उनके सिर में चोटें आई थीं.

संयुक्त राष्ट्र की एक रिपोर्ट के मुताबिक़ पिछले चार साल अब तक के सबसे गर्म साल रहे. विश्व मौसम विज्ञान संगठन ने दुनियाभर की सरकारों से ग्रीन हाउस गेसों में कटौती करने की गुज़ारिश की है.

संयुक्त राष्ट्र के महासचिव एंटोनियो गुटेरेश के प्रवक्ता स्टेफान यूजरिक ने कहा, "महासचिव ने विश्व मौसम विज्ञान संगठन के आंकड़े पर चिंता जताई है, जिसके मुताबिक साल 2015-16-17 और 18 अब तक के रिकॉर्ड सबसे गर्म साल रहे.

विश्‍लेषण के मुताबिक 2018 में सतह का वैश्विक औसत तापमान पूर्व-औद्योगिक आधार रेखा से 1.0 सेल्सियस ज़्यादा रहा. इन आंकड़ों के आने के बाद जलवायु परिवर्तन के मुद्दे पर और तेज़ी से कदम उठाए जाने की ज़रूरत है."

肺炎疫情:英国保守党意图审视“中国崛起”

由英国保守党议员组成的一个小组表示 英国首相约 色情性&肛交集合 翰逊在感染新型冠 色情性&肛交集合 状病毒康复两 色情性&肛交集合 周后, 色情性&肛交集合 将回到唐宁街继续 色情性&肛交集合 他的全职 色情性&肛交集合 领导工作。 在首相生病期 色情性&肛交集合 间代理...